
शासकीय भवनों में सबसे बदहाल शिक्षा का मंदिर जिम्मेदारों की अनदेखी से सवालों के घेरे में व्यवस्था

शासकीय भवनों में स्कूलों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है जहां से देश के भविष्य की नींव तैयार होती है लेकिन सवाल यह है कि जब यही शिक्षा के मंदिर बदहाल और उपेक्षित नजर आएं तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? कहीं भवन जर्जर है, कहीं साफ-सफाई का अभाव है तो कहीं कहीं पर तो छात्रों को पीने के लिए पानी की व्यवस्था बिलकुल भी नहीं है और तो और बहुत सारे स्कूलों में शौचालय भी नहीं है साथ ही कहीं बुनियादी सुविधाओं की कमी बच्चों और शिक्षकों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है स्कूलों की तस्वीरें उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करती है जिससे देश के बच्चों को बेहतर और सुरक्षित शिक्षा का माहौल देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है लेकिन स्थिति कई जगह भयावह बनी हुई है।

वहीं दूसरी तरफ अन्य विभागों की शासकीय भवनों को देखें तो पूरी साज सज्जा से परिपूर्ण देखा जाता है तो फिर जहां देश के भविष्य निर्माण कर्ता पैदा होते हैं उस भवन का इतनी उपेक्षा क्यों ?

एक ओर सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और स्कूलों में सुविधाएं बढ़ाने की बात करती है तो वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर कई शासकीय स्कूलों की हालत जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करती है।

बच्चों के भविष्य के लिए स्कूल सबसे जरूरी जगह है अगर स्कूल भवन और सुविधाओं की हालत ही खराब रहेगी तो बच्चों को बेहतर माहौल कैसे मिलेगा?”

सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्कूलों के रखरखाव के लिए आने वाले संसाधनों और योजनाओं की निगरानी कौन करता है? क्या जिम्मेदार अधिकारी समय-समय पर स्कूलों का निरीक्षण करते हैं? और यदि निरीक्षण होता है तो सामने आने वाली कमियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती ?
शिक्षा का मंदिर केवल एक सरकारी भवन नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की पहली सीढ़ी है ऐसे में इसकी उपेक्षा सिर्फ भवन की उपेक्षा नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल है
अब जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति का जायजा लें कमियों को चिन्हित करें और समय रहते आवश्यक सुधार कराएं। क्योंकि सवाल सिर्फ आज के स्कूल भवन का नहीं, बल्कि कल के भविष्य का है।
